मेरे देश की मिट्टी ...
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- साहित्य/लेख
- Updated: 18 April, 2026 16:06
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मेरे देश की मिट्टी
नहीं बदले वो पेड़ वो नदियां मेरे वतन की ,
नहीं बदला वो हिमालय वो लद्दाख का पठार,
फिर क्यों बदल गई,
मेरे देश की गंगा जमुना तहजीब की बहार ।
नहीं बदली वो मेरे गांव के लहराती फसलें,
वो फागुन में मिट्टी से निकली वो भीनी भीनी सी सुगंध,
फिर क्यूं बदल गया वो अपनों के बीच का प्यार ,
नहीं बदली वो सुबह की आरती, वो मस्जिद की अज़ान,
फिर क्यों बदल गया आज का इंसान ।
मजहब ना सिखाए कभी आपस में बैर
मिल जुल के रहने में ही है हम सब की खैर।
वरुण विक्रम

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