मेरे देश की मिट्टी ...

मेरे देश की मिट्टी ...

मेरे देश की मिट्टी 


नहीं बदले वो पेड़ वो  नदियां मेरे वतन की ,

नहीं बदला वो हिमालय वो लद्दाख का पठार,

फिर क्यों बदल गई,

मेरे देश की गंगा जमुना तहजीब की बहार ।

नहीं बदली वो मेरे गांव के लहराती फसलें,

वो फागुन में मिट्टी से निकली वो भीनी भीनी सी सुगंध,

फिर क्यूं बदल गया वो अपनों के बीच का प्यार ,

नहीं बदली वो सुबह की आरती, वो मस्जिद की अज़ान,

फिर क्यों बदल गया आज का इंसान ।

मजहब ना सिखाए कभी आपस में बैर

मिल जुल के रहने में ही है हम सब की खैर।

       वरुण विक्रम

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