पोषाहार' से 'निरीक्षण' तक सवाल ही सवाल: उरुवा बाल विकास परियोजना में आरोपों से मचा प्रशासनिक हड़कंप
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- Updated: 27 June, 2026 22:47
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166 आंगनबाड़ी केंद्रों की व्यवस्था पर सवाल, पोषाहार के कथित रूप से बाजार पहुंचने की चर्चा से मचा हड़कंप; सुपरवाइजर और सीडीपीओ की कार्यशैली पर उठे गंभीर आरोप, निष्पक्ष जांच की मांग तेज
संवाददाता
प्रयागराज- मेजा उरुवा।
प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी शासन व्यवस्था का दावा कर रही है, लेकिन उरुवा बाल विकास परियोजना विभाग इन दिनों गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर क्षेत्र में लगातार सवाल उठ रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन, पोषाहार वितरण, निरीक्षण व्यवस्था तथा कथित अवैध वसूली को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इन आरोपों ने न केवल विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, बल्कि मातृ एवं शिशु कल्याण जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की जमीनी हकीकत पर भी बहस छेड़ दी है।
बताया जा रहा है कि उरुवा बाल विकास परियोजना के अंतर्गत संचालित 166 आंगनबाड़ी केंद्रों की नियमित निगरानी और निरीक्षण की जिम्मेदारी विभागीय सुपरवाइजरों की है। आरोप है कि लंबे समय से प्रभावी निरीक्षण व्यवस्था नहीं होने के कारण कई केंद्रों की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि नियमित निगरानी होती तो योजनाओं के क्रियान्वयन पर इतने गंभीर सवाल खड़े नहीं होते।
विभाग में तैनात सुपरवाइजर हर्षिता सिंह तथा अन्य सुपरवाइजरों के साथ-साथ सीडीपीओ अर्चना सिंह की कार्यशैली को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि विभागीय स्तर पर शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जिससे कर्मचारियों में जवाबदेही का अभाव दिखाई दे रहा है। हालांकि संबंधित अधिकारियों द्वारा इन आरोपों की पुष्टि नहीं की गई है।
सबसे गंभीर आरोप पोषाहार वितरण को लेकर लगाए जा रहे हैं। क्षेत्र में चर्चा है कि गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों के लिए भेजा जाने वाला पोषाहार कथित रूप से लाभार्थियों तक पूरी तरह पहुंचने के बजाय खुले बाजार में 250 से 300 रुपये प्रति बोरी तक बिकता दिखाई दे रहा है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह सरकारी योजनाओं के उद्देश्य पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है। इस दावे की अभी किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पत्रकार द्वारा सुपरवाइजर हर्षिता सिंह से इस संबंध में बातचीत किए जाने पर उन्होंने विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हुए कहा कि वह केवल सीडीपीओ के निर्देशों का पालन कर रही हैं। निरीक्षण व्यवस्था पर पूछे गए सवालों के दौरान भी उन्होंने विभागीय स्तर पर जवाब दिए जाने की बात कही।
इससे पहले भी रजिस्टर जमा कराने और कथित अवैध वसूली को लेकर विवाद सामने आया था। आरोप है कि समाचार प्रकाशित होने के बाद आनन-फानन में कई केंद्रों पर रजिस्टर पहुंचाए गए और दस्तावेजी औपचारिकताएं पूरी की गईं। इस घटनाक्रम ने विभाग की कार्यप्रणाली पर और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों से निकलकर वास्तविक पात्रों तक पहुंचे, इसके लिए आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
अब निगाहें जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उरुवा बाल विकास परियोजना विभाग में लगे इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी केवल फाइलों और औपचारिकताओं तक सीमित रह जाएगा। क्षेत्र की जनता पारदर्शी कार्रवाई और जवाबदेही की प्रतीक्षा कर रही है।

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