गाँव में संगीतमय श्रीमद् भागवत सुनते श्रोता कृष्ण रुक्मिणी विवाह।
- Posted By: Anil Kumar
- Breaking News
- Updated: 16 November, 2021 23:06
- 1189

प्रकाश प्रभाव न्यूज
कौशाम्बी-16-11-2021
रिपोर्ट-अनिल कुमार
गाँव में संगीतमय श्रीमद् भागवत सुनते श्रोता कृष्ण रुक्मिणी विवाह।
विकास खंड कौशाम्बी के मेडरहा गाँव श्रीमद् भागवत कथा संपन्न कथावाचक पंडित कृष्णानंद तिवारी जी महाराज छत्तीसगढ़ बिलासपुर के कार्यक्रम के आयोजक भानु दत्त मिश्रा हैं।
कौशाम्बी। बारा मेडरहा गाँव संगीतमय भागवत समाप्त कथा वाचक पंडित श्री कृष्णा नंद तिवारी जी महाराज द्वारा अंतिम दिवस की कथा में बताया कि इस भव सागर से मुक्ति पाने हेतु भागवान की कथा सुनना कहना एवं आत्मसाद करना ही मुक्त का प्रमुख साधन है भागवान श्री कृष्ण जब द्वारिका में थे उसी समय कुदंनपुर में राजा रुक्म अपनी पुत्री रुक्मिणी का विवाह करने जा रहे थे। बड़े जोरो स्वयंबर तैयारी बड़ी तेजी से हो रही थी।
तभी रुक्मिणी को पता चला की उनका विवाह राजा शिशुपाल के साथ होने जा रहा है। जबकि रुक्मिणी अपना पति श्री कृष्ण को मान चुकी थी। उन्होने मथुरा के लिए श्री कृष्ण जी के पास एक ब्रहमण के द्वारा श्री कृष्ण के पास के पत्र भेजा आप मुझे आकर कुदंनपुर से ले जाए। मैं आपको अपना पति मान चुकी हूँ।
यदि आप ने आने में देरी की तो मैं आत्महत्या करलूगी ब्रहमण का पत्र पाते ही श्री कृष्ण रूक्मिणी के पत्र पाते ही कुदंनपुर चल पड़े। कुदंनपुर के समस्त नरनारी भागवान श्री कृष्ण को देखकर मोहित हो गए मौका पाकर रूक्मिणी का हारण कर लिया और नागर से बाहर चले गए। रास्ते में रूक्मिणी के भाई युद्ध हुआ और कृष्ण ने रूक्मिणी के भाई को परास्त कर द्वारिका ले गए जहा रुक्मिणी का विवाह श्री कृष्ण से हो गया। ईधर कलजुग का प्रवेश हो गया था।
राजा परीक्षित एक बार शिकार करने निकले जहा के ऋषि के आश्रम में पहुचे जहा वे प्यास बयकुल थे। उन्होने देखा कि एक ऋषि तपस्या में लीन थे। ऋषि से जल की मांग की परन्तु ऋषि पूजा में लीन थे परीक्षित ने सोचा की ऋषि अहंकारी है और मेरा आपमान कर रहा है। आश्रम में एक मरा हुआ सर्प पड़ा हुआ था। परीक्षित ने आवेश में आकर उस सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया ।
कुछ देर के बाद ऋषि पत्र आश्रम में आए और आपने पिता के गले में मरा हुआ सर्प देखकर काफी दुःखित हुए और आपने पिता के गले में सर्प डालने वाले को सातवें दिन तक्षक सर्प काटने मृत्यु का श्राप दे दिया जब यह खबर परीक्षित को मालूम हुई तो ऋषि आश्रम जाकर काफी ऋषियों क्षमा माँगा और अपनी मुक्ति हेतु गंगा के किनारे जा रहे थे।
उनकी मुलाकात शुकदेव जी से हुई शुकदेव जी ने परीक्षित को सात दिन में श्रीमद् भागवत की कथा सुनाई जिससे सात दिनो में राजा परीक्षित की मुक्ति हुई । श्रीमद् भागवत कथा मुक्ति का सर्वोत्तम मार्ग श्रीमद् भागवत कथा है। कार्यक्रम के आयोजक--भानु दत्त मिश्रा हैं।
Comments