Thursday 03 Dec 2020 16:28 PM

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क्या किसानों की बलि लेकर ही एक्टिव होता है वन विभाग ? ट्रैंकुलाइज कर बाघिन को पकड़ा

क्या किसानों की बलि लेकर ही एक्टिव होता है वन विभाग ? ट्रैंकुलाइज कर बाघिन को पकड़ा

पीलीभीत न्यूज

रिपोर्ट:- नीलेश चतुर्वेदी


क्या किसानों की बलि लेकर ही एक्टिव होता है वन विभाग ? ट्रैंकुलाइज कर बाघिन को पकड़ा 

मेनका गांधी के कहने पर जिम कॉर्बेट से भेजे गए डॉ दुष्यंत शर्मा

दो दर्जन के करीब ग्रामीण जानलेवा हमले की आईपीसी धारा 307 सहित कई गंभीर धाराओं में गए जेल

वन विभाग की शिथिलता, अनदेखी और लापरवाही ने पैदा की कानून वयवस्था  समस्या

कई पुलिसकर्मी बवाल में हुए घायल, लाखों के सामान की हुई क्षति

पीलीभीत में वन विभाग की टीम ने उस बाघिन को ट्रैंकुलाइज कर पकड़ लिया है जिसके बीते दो दिनों के हमलों में एक युवा किसान की जान चली गई, एक जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है और एक घायल है। इसके बाद वन विभाग के अफसरों ने बाकायदा अपनी पीठ थपथपाते हुए एक शानदार फोटो सेशन किया। ध्यान रखा गया कोई बहादुर वनकर्मी इस फोटो सेशन में छूट न जाये। इसके बाद फील गुड का एहसास होने का दावा किया गया।  


    फोटो में आप तमाम बहादुर वनकर्मियों को सीना चौड़ा कर शान से खड़े देख सकते हैं। यह शान इसलिए है क्योंकि इन्होंने इस खतरनाक हो चुकी बाघिन को सफलता पूर्वक ट्रंकुलाइज कर पकड़ लिया है और उसे अब कानपुर ज़ू ले जाया गया है। बताया जा रहा है कि बाघिन को पकड़ने के लिए मंगलवार को ट्रंकुलाइज करने का ऑर्डर उच्च अधिकारीयों से मिल गया और बहुत ही परफेक्ट योजना बनाकर बाघिन को सुरक्षित पकड़ लिया गया। इस बाघिन को सुरक्षित पकड़ने के लिए वन विभाग के अफसरों का अब पूरा फोकस था लिहाजा दुधवा टाइगर रिज़र्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक, लखीमपुर नार्थ के अनिल वर्मा यहाँ तक कि प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ़ फारेस्ट सुनील पांडेय ने भी डेरा डाल लिया था।  

   बात करें डॉक्टर्स की तो बताया जा रहा है कि सांसद मेनका गांधी के कहने से जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से डॉ दुष्यंत शर्मा को विशेष रूप से बाघिन को ट्रंकुलाइज करने के लिए बुलाया गया था, इसके आलावा जिम कॉर्बेट से ही डॉ आयुष्मान व कानपुर ज़ू से डॉ आर.के. सिंह को बुलाया गया था वहीं पीलीभीत में  अब से पहले ट्रैंकुलाइज करने वाले डॉक्टर्स की टीम को लीड करते रहे डॉ इस.के राठौर, डॉ राजुल सक्सेना व डॉ दक्ष गंगवार को भी टीम में शामिल किया गया था।  


  इसके बाद ट्रंकुलाइज ऑपरेशन शुरू किया गया।  बाघिन की लोकेशन माला वन क्षेत्र से लगे धमेला ताल के पास मिलते ही दो तरफ से ट्रैक्टर से घेराबंदी की गई। एक ट्रैक्टर पर डॉ एस.के.राठौर और डॉ राजुल सक्सेना, दूसरे ट्रैक्टर पर डॉ आर.के.सिंह व डॉ दक्ष गंगवार, वहीं बीच में एक जीप से डॉ. दुष्यंत शर्मा व डॉ आयुष्मान आगे बढ़े। बाघिन धमेला ताल के पास लगभग तीन मीटर रेडियस के नरकुल के झुरमुट में थी। सही शूटिंग साइट मिलते ही डॉ दुष्यंत ने सटीक निशाना लगाते हुए डॉट सीधे बाघिन के पुट्ठे में लगा दी। बाघिन डॉट लगने के बाद एक बार उठी और नरकुल झाड़ी के दूसरी ओर बैठ गई। चंद पलों में ही बाघिन बेहोश हो चुकी थी। डॉक्टर्स की टीम ने तेजी से आगे बढ़कर बाघिन की जरुरी जाँच मौके पर ही कीं। डॉक्टर्स की इस सफलता के बाद पीलीभीत टाइगर रिजर्व के नवीन खंडेलवाल सहित कई अधिकारी व् वनकर्मियों ने डॉक्टर्स के साथ खड़े होकर एक फोटो सेशन कराकर अपनी कर्तव्यपरायणता के प्रमाण सुरक्षित किए।  

 इसके बाद बाघिन को माला रेस्ट हाउस लाया गया। बाघिन के पैर में एक घाव देखा गया। लेकिन डॉक्टर्स के मुताबिक इस घाव से बाघिन को कोई खतरा नहीं है। माला रेस्ट हाउस में पहुँचने के कुछ देर बाद ही बाघिन होश में आकर बैठ गई। जिसके बाद उसे कानपुर ज़ू ले जाया गया है. 

    यह तो थी वन विभाग द्वारा बाघिन को सफलता पूर्वक ट्रंकुलाइज करने की कहानी।  

लेकिन जिस तरह गजरौला थाना क्षेत्र में माला इलाके की गोयल कलोनी के किसान सुवेन्दु विश्वास की जान बाघिन के हमले में जाने और बवाल के बाद वन विभाग ने तेजी से प्रयास करते हुए बाघिन को पकड़ लिया। उससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि जब यह बाघिन पिछले 15 दिन से खेतों में देखी जा रही थी और किसानों की जान को खतरा बना हुआ था, किसान लगातार वन विभाग को बाघिन की लोकेशन बता रहे थे, तमाम वीडियो भी बाघिन के बनाये गए। लेकिन जो तेजी किसान की मौत और बवाल के बाद वन विभाग के अधिकारीयों ने दिखाई वह तेजी पहले से दिखाई होती तो एक युवा किसान की जान न जाती और न ही पास के ही गांव रिछौला का किसान रमनदीप सिंह लखनऊ के अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता। 

        इससे क्षेत्र में इस बात की चर्चा है कि वन विभाग को सही मायने में एक्टिव होने में किसानों की बलि चाहिए होती है। तभी उनकी आत्मा और कर्तव्यपरायणता का जज्बा जागता है। यह बात गलत भी नहीं लगती क्योंकि दो महीने पहले भी एक बाघ को महीने भर खेतों में चहलकदमी करते देखा गया। ग्रामीण वन विभाग को सूचना देते रहे वन विभाग के अधिकारी वनकर्मियों की चुस्त गश्त का दावा करते रहे। बाघ को पकड़ने की बात पर ट्रंकुलाइज की परमिशन का इंतजार करने की बात करते रहे। लेकिन जब उसी बाघ ने एक किसान और उसके साथी मजदूर यानि दो लोगों को मार डाला तो कुछ ही घंटों में ट्रंकुलाइज करने की परमिशन के साथ टाइगर को पकड़ लिया गया। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। बल्कि इस बार तो किसान की बलि के साथ बड़ा बवाल हुआ है। वनविभाग के अधिकारीयों और कर्मचारियों की शिथिलता, अनदेखी और लापरवाही ने कानून व्यवस्था की भी समस्या खड़ी कर दी। जिससे हुए बवाल में कई पुलिसकर्मी भी गंभीर घायल हो गए, साथ ही दो दर्जन के करीब ग्रामीणों को जानलेवा हमले की आईपीसी धारा 307 सहित कई गंभीर धाराओं में जेल भेजा गया है। लिहाजा यह दोनों प्रकरण इस बात का समर्थन करते हैं कि वन विभाग को एक्टिव होने के लिए किसान की बलि चाहिए होती है।

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