क्या है पौराणिक महत्त्व #वटसावित्रीअमावस्या_व्रत ?
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- साहित्य/लेख
- Updated: 21 May, 2020 17:06
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प्रकाश प्रभाव न्यूज़
क्या है पौराणिक महत्त्व #वटसावित्रीअमावस्या_व्रत ?
पंडित सुरेन्द्र शुक्ल
22-05-2020 को रखेंगे व्रत सोभाग्याशाली महिलाएं पति के दीर्घायु की कामना के लिए ।
स्कन्द पुराण के अनुसार इस व्रत को ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को रखा जाता है, लेकिन निर्णयामृतादि के अनुसार यह व्रत जयेष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को करने का विधान है। यह व्रत सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को रखती हैं। कहा जाता है जिस तरह से सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राणों को यमराज के हाथों से छीन कर लाई थी, उसी तरह इस व्रत को करने से पति पर आने वाले सारे संकट दूर हो जाते हैं। इस दिन वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा और कथा सुनी जाती है। माना जाता है कि इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश मौजूद होते हैं।
बांस के पंखे से हवा करें
व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके नए कपड़े पहनें और सोलह श्रृंगार करें। इसके बाद वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री व सत्यावान की मूर्ति स्थापित करें। इन्हें धूप, दीप, रोली और सिंदूर से पूजन करके लाल कपड़ा अर्पित करें। बांस के पंखे से इन्हें हवा भी करें। इसके बाद बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगाना ना भूलें। रोली को बरगद यानि वट वृक्ष से बांधकर 5, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें और कथा सुनें।
चने को प्रसाद के रूप में चढ़ाएं
इस व्रत में चने को प्रसाद में रूप में चढ़ाने का नियम है। कथा के अनुसार जब यमराज सत्वान के प्राण ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे पीछे चलने लगी। ऐसे में यम ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने एक वरदान में सौ पुत्रों की माता बनना मांगा और जब यम ने उन्हें ये वरदान दिया तो सावित्री ने कहा कि वे पतिव्रता स्त्री है और बिना पति के मां नहीं बन सकती। यमराज को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने चने के रूप में सत्यवान के प्राण दे दिए। सावित्री ने सत्यवान के मुंह में चना रखकर फूंक दिया, जिससे वे जीवित हो गए। तभी से इस व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है।
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